बिजनौर को महात्मा विदुर की कर्मभूमि होने का गौरव प्राप्त हैं,

यह दुनियां के सर्वाधिक बुद्घिमान महात्मा विदुर की यह पावन आश्रम स्थली (विदुरकुटी) है तभी तो बिजनौर को महात्मा विदुर की कर्मभूमि होने का गौरव प्राप्त है

यह वही जगह है जहां श्रीकृष्ण दुर्योधन का छप्पन भोग छोड़ महात्मा विुदर का भाव व स्वाद से भरे बथुए का साग खाया था यहाँ आज भी बथुए के पेड़ उस स्मृति को जीवंत कर रहे है दूर दराज से आने वाले भक्त प्रसाद में बथुआ लेकर जाते हैं।

यह स्थान अनूठा महाभारत की घटनाओं से सम्बंधित है महात्मा विदुर पूजनीय व्यक्तियों में से थे वह सत्यवादिता निष्पक्षता के गुणों से परिपूर्ण थे जब महाभारत का युद्ध शुरू होने वाला था तो पांडवों और कौरवों ने उनसे अनुरोध किया की वे उनके बच्चों और महिलाओं की देखभाल वह स्वयं करे

युद्ध प्रारम्भ होने से पहले कौरव और पांडव अपने परिवारिक सदस्यों को किसी क्षति से बचाने के लिए सुरक्षित जगह की तलाश में थे विदुर कुटी ही उनके परिवारजनों के लिए सुरक्षित साबित हुआ लेकिन विदुर कुटी में उन लोगों के रहने के लिए पर्याप्त जगह नहीं थी इसलिए महात्मा विदुर ने स्त्रियों और बच्चों को पास ही में स्तिथ एक स्थान पर ठहराने का निर्णय लिया जिस जगह को दारानगर के नाम से जाना जाता है,

विदुर कुटी का इतिहाद महाभारत काल से जुड़ा है हस्तिनापुर राज्य के महामंत्री थे विदुर जब दुर्योधन ने पांडवों के विरुद्ध युद्ध करने की बात कही तो विदुर ने इस युद्ध को टालने के अनेक प्रयास किये लेकिन वह सफल न हो सके और सभी की शांति के लिए उन्होंने बिजनौर के दारानगर गजँ आकर तपस्या प्रारम्भ कर दी

कहीं कहीं श्रीकृष्ण द्वारा यहा केले के छिलके खाने का जिक्र भी मिलता है।बिड़ला द्वारा इस मंदिर का निर्माण कराया गया जो 1978 में पूरा हुआ‌ इस विदुर कुटी मंदिर का उद्घाटन देश के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने 1962 में किया था

गंगा के किनारे होने के कारण इसका नाम कालांतर में दारानगर यानी स्त्रियों का नगर पड़ गया यहाँ युद्ध मे हुई विधवाओ को रखा गया था
विदुर कुटी को बिड़ला मंदिर भी कहते हैं जिसके प्रांगण में विदुर जी की विशाल मूरत स्‍थापित है यहां सुदर्शन चक्र धारी श्रीकृष्ण भी विराजमान हैं जिस मे धृतराष्ट्र संजय कौरवों की सभा में द्रौपदी का चीरहरण अर्जुन को उपदेश देते श्रीकृष्ण आदि प्रसंगों को यहां दर्शाया गया है

बिजनौर के मशहूर इतिहासकार श्री अशोक मधुप जी बताते हैं कि स्वयं श्री कृष्ण विदुर से मिलने विदुर कुटी आये थे आज भी यहा महात्मा विदुर के पद्चिन्ह मौजूद हैं विदुर कुटी शांतिप्रिय लोगों की साधना के लिए बहुत अच्छा विकल्प है

हालाँकि कभी गंगा कभी महात्मा विदुर के मंदिर के चबूतरे को छूते हुए बहा करती थी अब गंगा इससे काफी दूर हो गई है

प्रस्तुति———-तैय्यब अली

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